सुमित्रानंदन पंत

                       सुमित्रा नंदन पंत

P. D. Malaviya Graduate Teacher College - Rajkot 
Bhoraniya Rutviben Jayeshbhai 
( Roll no. 37 )
Method : 1) Mathematics, 2) Science
Lpc - 3 ( part A activity 4 )


जन्मसुमी 20 मई 1900 कौसानी , उत्तर-पश्चिमी प्रांत , ब्रिटिश भारत

मृत28 दिसंबर 1977 (आयु 77 वर्ष)
इलाहाबाद , उत्तर प्रदेश , भारत
पेशालेखक, कवि
राष्ट्रीयताभारतीय
शिक्षाहिंदी साहित्य
विषयसंस्कृत
उल्लेखनीय पुरस्कारपद्म भूषण (1961)
ज्ञानपीठ पुरस्कार (1968)
कवि का परिचय - 

सुमित्रानंदन पंत को ‘प्रकृति के सुकुमार कवि’ के रूप में भी जाना जाता है, उनका जन्म आज के उत्तराखण्ड के बागेश्वर ज़िले के कौसानी में २० मई १९०० को हुआ। जन्म के कुछ ही घंटों बाद उनकी माँ परलोक सिधार गईं। उनका लालन-पालन उनकी दादी ने किया। पंत जी का बचपन में गोसाईं दत्त नाम रखा गया था। १९१० में शिक्षा प्राप्त करने गवर्नमेंट हाईस्कूल अल्मोड़ा गये। यहीं उन्होंने अपना नाम गोसाईं दत्त से बदलकर सुमित्रानंदन पंत रख लिया।

आत्मिक कविता में प्रेम के बारे में - 

आज के धरती की स्थितियां है आदमी प्रेमियों पर उंगली उठाना चाहता है और उनकी सोच है कि वह प्रेम की ऊंची कल्पना नहीं कर पाता। यहां कवि ने सौंदर्य की प्रतिनिधि करता को स्त्री की प्रकृति के साथ उपमा देकर स्त्री के सौंदर्य की बात की गई है। सौंदर्य हिमालय के आंचल में उत्पन्न हुआ था। इसलिए वह कवि की रग रग में बसा है।  स्त्री की प्रशंसा करके कवि कहते हैं कि स्त्री का हृदय तिजोरी में बंद पड़ा है। जब फूल अपने नाल से बंधा रहता है इसी प्रकार स्त्री को अपने प्रियजन और अपने परिवार के साथ तो अपनी भावना को उजागर करना ही है परंतु समस्त लोगों को देनी चाहिए। स्त्री का सबसे सुंदर हिस्सा देह नहीं है बल्कि उनकी भावनाएं हैं। इसमें कवि कहना चाहते हैं कि उसका व्यक्तिगत कुछ नहीं है। यह मानव जीवन का तब का इतिहास है और अभी भी यही इतिहास है और कभी कवि अच्छी तरह से जानते हैं कि मनुष्य का विकास तभी होगा जब स्त्री स्वतंत्र होकर इस धरती पर विचर सकेंगे। उसे भय नहीं रहेगा।

अध्यात्म और विज्ञान के बारे में - 

अभी के मत से विज्ञान ने जो की एक झड जगत,  एक बड़ी भारी बाधा था जो मनुष्य के जीवन में  उस बाधा को भौतिक जगत ने मिटा दिया है।  अब आप देखते हैं कि देशकाल सब मनुष्य की मुट्ठी में है। देश विदेश के लोगों के विचार , उनके भावी दृष्टिकोण, नैतिक दृष्टिकोण, संदेशवादी दृष्टिकोण, चाहे रेडियो से हो, चाहे सिनेमा से हो, चाहे देशांतरण घूमने से हो , मनुष्य एक दूसरे के निकट आ रहे और ये दृष्टिकोण भी निकट आ रहे हैं। तो पहले ये संभव नहीं था। भौतिकवाद का यह आध्यात्म वाद का समनवय इस युग के लिए अत्यंत आवश्यक है। कवि कहना चाहते हैं कि उन्होंने अध्यात्म को मन के शिखर से उच्च माना है। लेकिन आज का अध्यात्म जीवन दर्शन कहता है कि जिसे आप भगवान कहे, चाहे आत्मिक संचरण कहे वह तो इसी जीवन के चरण पर प्रतिष्ठित करना है। कवि के मत से आज का युग निर्माण का योग है इसमें तो विज्ञान और अध्यात्म इनको मिलकर काम करना है। 

मित्रों के बारे में - 

कवि अपने मित्र के बारे में कहते हैं कि उनके चारो और  मित्र थे वो इस युग की एक एक तरह से अपने-अपने विभिन्न विभागों के प्रतिनिधि रहे हैं। कवि अपने मित्र निराला की बात करते हुए कहते हैं कि उन दोनों मित्रों का स्वभाव भिन्न-भिन्न था लेकिन स्वभाव से मित्रता में कोई फर्क पड़ता नहीं था। दूसरे मित्र बच्चन की बात करते कहते हैं कि कवि उसके घर पर भी रहते थे। थोड़े बहुत मतभेद होते हैं लेकिन उनकी मित्रता पर कोई असर नहीं होती है। बच्चन और तेजी जी कवि के सबसे परम मित्र रहे हैं। नरेंद्र तो छोटा भाई जैसा रहा है। बच्चन, नरेंद्र , दिनकर इन सब को पाकर कवि अपने आप को बहुत सौभाग्यशाली मानते हैं।

जगत में कोई एक परिवर्तन लाने के बारे में - 

परिवर्तन को कवि ने जीवन का शाश्वत सत्य माना है। यहाँ सबकुछ परिवर्तनशील है। परिवर्तन ही जीवन का नियम है। इसमें परिवर्तन के कोमल और कठोर दोनों रूपों का चित्रण है। परिवर्तन को रोकने की क्षमता किसी में भी नहीं है। इस परिवर्तन आधारित यही कविता 1924 में लिखी गई थी। कविता रोला छंद में रचित है। यह कविता 'पल्लव' नामक काव्य संग्रह में संकलित है। परिवर्तन कविता को समालोचकों ने एक ‘ग्रैंड महाकाव्य' कहा है। स्वयं पंत जी ने इसे पल्लव काल की प्रतिनिधि रचना मानते हैं।

अपने आपके बारे में - 

कवि का संपूर्ण साहित्य 'सत्यं शिवं सुन्दरम्' के आदर्शों से प्रभावित होते हुए भी समय के साथ निरंतर बदलता रहा है। जहां प्रारंभिक कविताओं में प्रकृति और सौंदर्य के रमणीय चित्र मिलते हैं । वहीं दूसरे चरण की कविताओं में छायावाद की सूक्ष्म कल्पनाओं व कोमल भावनाओं के और अंतिम चरण की कविताओं में प्रगतिवाद और विचारशीलता के । उनकी सबसे बाद की कविताएं अरविंद दर्शन और मानव कल्याण की भावनाओं से ओतप्रोत हैं। पंत परंपरावादी आलोचकों और प्रगतिवादी तथा प्रयोगवादी आलोचकों के सामने कभी नहीं झुके। उन्होंने अपनी कविताओं में पूर्व मान्यताओं को नकारा नहीं। उन्होंने अपने ऊपर लगने वाले आरोपों को 'नम्र अवज्ञा' कविता के माध्यम से खारिज किया। वह कहते थे 'गा कोकिला संदेश सनातन, मानव का परिचय मानवपन।'इसके अलावा उनके कविता संग्रहो में  महिलाओं के महत्व को भी दर्शाया गया है। इस प्रकार कवि ने प्रकृति और स्त्री दोनों का महत्व दर्शाते अपनी कविता की रचना की है।


                           🙏 धन्यवाद 🙏


















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